Best Hindi Kavita - About Love and Life

Best Hindi Kavita – About Love and Life

Kavita is that form of literature in which a story or emotion is expressed artistically through a language. the history of Kavita and the philosophy of poetry in india is very old. its origin can be understood from bharatmuni. kavita literally means a poetic composition or work of a poet, which is duly tied into a series of verses.

there is a rich tradition of critics in indian literature regarding what is Kavita or poetry – from sanskrit scholars like acharya vishwanath, panditraj jagannath, pandit ambikadatta vyas, acharya shripati, bhamaha etc. to modern acharyas like ramchandra shukla and jaishankar prasad and modern meera mahadevi verma of the era has expressed her views by clarifying the nature of the poem.

हारना तब आवश्यक हो जाता है जब लड़ाई अपनो से हो ! और जीतना तब आवशयक हो जाता है, जब लड़ाई अपने आप से हो !!

मंज़िल मिले यह तो मुकद्दर की बात है, हम कोशिश ही ना करें , यह तो गलत बात है… किसी ने बर्फ से पूछा की तुम इतनी ठंडी क्यों हो ? बर्फ ने बहुत ही सुन्दर उत्तर दिया- मेरा अतीत भी पानी, मेरा भविष्य भी पानी फिर गर्मी किस बात पे रखूँ ?

कवि श्री हरिवंश राय बच्चन

दुखी-मन से कुछ भी न कहो! व्यर्थ उसे है ज्ञान सिखाना, व्यर्थ उसे दर्शन समझाना, उसके दुख से दुखी नहीं हो तो बस दूर रहो!

दुखी-मन से कुछ भी न कहो! उसके नयनों का जल खारा, है गंगा की निर्मल धारा, पावन कर देगी तन-मन को क्षण भर साथ बहो! दुखी-मन से कुछ भी न कहो! देन बड़ी सबसे यह विधि की, है समता इससे किस निधि की?

दुखी दुखी को कहो, भूल कर उसे न दीन कहो? दुखी-मन से कुछ भी न कहो! 

कवि श्री हरिवंश राय बच्चन

ज़मीं पे चल न सका आसमान से भी गया…कटा के पर को परिंदा उड़ान से भी गया…किसी के हाथ से निकला हुआ वो तीर हूँ जो…हदफ़ को छू न सका और कमान से भी गया

भुला दिया तो भुलाने की इंतिहा कर दी…वो शख़्स अब मिरे वहम ओ गुमान से भी गया..तबाह कर गई पक्के मकान की ख़्वाहिश….मैं अपने गाँव के कच्चे मकान से भी गया

पराई-आग में कूदा तो क्या मिला ‘शाहिद’…उसे बचा न सका अपनी जान से भी गया

शाहिद कबीर

कोई ग़ज़ल सुना कर क्या करना…यूँ बात बढ़ा कर क्या करना..तुम मेरे थे, तुम मेरे हो…दुनिया को बता कर क्या करना

तुम साथ निभाओ चाहत से…कोई रस्म निभा कर क्या करना..तुम खफ़ा भी अच्छे लगते हो..फिर तुमको मना कर क्या करना

तेरे दर पे आके बैठे हैं..अब घर भी जाकर क्या करना..दिन याद से अच्छा गुजरेगा…फिर तुम को बुला कर क्या करना।

कहाँ तक ये मन को अंधेरे छलेंगे..उदासी भरे दिन कहीं तो ढलेंगे..कभी सुख कभी दुख, यही जिंदगी हैं।ये पतझड़ का मौसम घड़ी दो घड़ी हैं।

नये फूल कल फिर डगर में खिलेंगे उदासी भरे दिन कहीं तो ढलेंगे भले तेज कितना, हवा का हो झोंका मगर अपने मन में तू रख ये भरोसा जो बिछड़े सफ़र में तुझे फिर मिलेंगे उदासी भरे दिन कहीं तो ढलेंगेकहे कोई कुछ भी, मगर सच यही है।

लहर प्यार की जो कहीं उठ रही है।उसे एक दिन तो किनारे मिलेंगेउदासी भरे दिन कहीं तो ढलेंगे ।।

उस रोज़ फिर से हुईं थीं मुलाकात दोहराई थी फिर से हर वही बात पर कुछ बात अलग थी भरी हुईं छत अकेली सी पलंग थी

एक मजबूत सहारा तेरा था खोखला सा किनारा मेरा था थे सामने दोनों ही बड़े ही चुपचाप अनजान मानो नए नए हुए थे अनजान

बस नजरे बचा कर सब परख रहे थे एक दूसरे के हालात के झलक समझ रहे थे दिल में हलचल जुबां सख्त थी भला कुछ कहते तो क्या कहते इतने सालों बाद साथ कुछ वक्त रहे थे

अचानक एक गड़गड़ाहट आई जैसे किसी तेज़ तूफ़ान की आहट आई सिमटे दोनो के दिल एक जहां में कह दिया सब कुछ की कितनी अकेला रहा मैं

बीती फिर वो रात तन्हाई सुबह होनी थी फीर से जुदाई सुबह हुईं चली फिर से ज़िंदगी फीर से एक पहलू पर चादर ढकी।

सियासी आदमी की शक्ल तो प्यारी निकलती है..मगर जब गुफ़्तगू करता है चिंगारी निकलती है..

लबों पर मुस्कुराहट दिल में बेज़ारी निकलती है…बड़े लोगों में ही अक्सर ये बीमारी निकलती है ।

कश्ती है पुरानी मगर दरिया बदल गया,मेरी तलाश का भी तो जरिया बदल गया!!

ना शक्ल ही बदली न ही बदला मेरा किरदार,बस लोगों के देखने का नजरिया बदल गया!!

हम जिस दिए के दम पे बगावत पे उतर आये,सोहबत मे अंधेरे के वो दिया बदल गया!!

ईमान अदब इल्म हया कुछ भी नहीं कायम,मत पूछिये इस दौर मे क्या क्या बदल गया।।

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