Short Deep Sad Poetry

Short Deep Sad Poetry

We have brought new short deep sad poetry for all of you, read and share your feelings with girlfriend / boyfriend poetry in hindi.

कभी उसने भी हमें चाहत का पैगाम लिखा था,सब कुछ उसने अपना हमारे नाम लिखा था,
सुना है आज उनको हमारे जिक्र से भी नफ़रत है,जिसने कभी अपने दिल पर हमारा नाम लिखा था।

मुश्किलें आती है आ जाए घबराता कौन हैं।दिल अगर टूट भी जाए तो मर जाता कौन है।जो खुद ही क़ैद में आकर बैठ जाते हो,ऐसे परिंदो को उड़ाता कौन है।।बेशक बहुत मुश्किल है यू तनहा रहना।सब जब बेवफ़ा ही हो गए होतो वफ़ा निभाता कौन है ।।

बिछड़ के तुम से ज़िंदगी सज़ा लगती है,यह साँस भी जैसे मुझ से ख़फ़ा लगती है।

तड़प उठता हूँ दर्द के मारे,ज़ख्मों को जब तेरे शहर की हवा लगती है।अगर उम्मीद-ए-वफ़ा करूँ तो किस से करूँ,मुझ को तो मेरी ज़िंदगी भी बेवफ़ा लगती है।

तुझसे दूर भी हूँ मैं  और पास भी कहने को खुश भी हूँ मैं और उदास भी,न जाने क्या हो रहा है इन दिनों नफरत भी तू ही है और प्यारा एहसास भी…!!

कब तक मैं फिरता रहूँ इस रेगिस्तान में कड़कती धुप भी तू है और मन की प्यास भी,सब भूल कर तुझे अपना तो बना लूँ मैं पर दुश्मन भी तू है और खास भी, जितना सोचूं उतनी नफरत , जितना भूलूँ उतना प्यार बीता हुआ कल भी तू है , आगे का कयास भी….!!

किस मर्ज की ,किस हक़ीम से क्या दवा लूँ ?दवा भी तू , दुआ भी तू और आने वाली सांस भी,कौन आये ग अब उन दरवाजों के पीछे देखने मुझे मैं तेरे शहर से काफी दूर भी हूँ और पास भी…!!

पास आ जरा दिल की बात सुनाऊ तुझको,कैसे धरकता है दिल आवाज़ सुनाऊ तुझको,आ के तू देख ले दिल पे लिखा है नाम तेरा,अगर कहता है तो दिल चीर के दिखाऊ तुझको..

जितना जलाया है तुमने प्यार में मुझको,दिल तो करता है की मै भी जलाऊ तुझको,अजनबी होता तो ऐसा भी कर लेता शायद ,मगर तू तो अपना है कैसे सताऊ तुझको..!!

तू नहीं तो ये नज़ारा भी बुरा लगता है..चाँद के पास सितारा भी बुरा लगता है..ला के जिस रोज़ से छोड़ा है तुने भवँर में मुझको..मुझको दरिया का किनारा भी बुरा लगता है..!

आह और दर्द बस तेरा तलबगार हुआ….आंख पत्थर हुई, अश्क आबशार हुआ ये जुदाई भी अमावस का एक सितारा है।

चांद के बिन ये फलक भी दागदार हुआ…मेरी पलकों का झपकना बड़ा मुश्किल है।

ऐसा तबसे है जबसे तेरा दीदार हुआ सो रहे हैं इन मकानों के बाशिन्दे सभी मैं जगा रहके बस्ती का गुनहगार हुआ….!!

एक ऐसी आखरी ख्वाहिश थी तेरी की महबूब किसी और को बना लेना अफ़सोस तेरी आखरी ख्वाहिश पूरी कर पता नहीं

की जो इश्क तुझसे था वो किसी और से होता ही नहीं  नादाँ सा दिल तेरे सिवा किसी पर मरता ही नहीं..!!

जिसने भी की मुहब्बत, रोया जरूर होगा….वो याद में किसी के खोया जरूर होगा।

दिवार के सहारे, घुटनों में सिर छिपाकर….वो ख्याल में किसी के खोया जरुर होगा।

आँखों में आंसुओ के, आने के बाद उसने,धीरे से उसको उसने, पोंछा जरुर होगा..जिसने भी की मुहब्बत, रोया जरूर होगा।

अजीब था उनका अलविदा कहना,सुना कुछ नहीं और कहा भी कुछ नहीं,बर्बाद हुवे उनकी मोहब्बत में,की लुटा कुछ नहीं और बचा भी कुछ नहीँ…!!

बिछड़ के तुम से ज़िंदगी सज़ा लगती है,यह साँस भी जैसे मुझ से ख़फ़ा लगती है,तड़प उठता हूँ “दर्द” के मारे…

ज़ख्मों को जब तेरे शहर की हवा लगती है,अगर उम्मीद-ए-वफ़ा करूँ तो किस से करूँ,मुझको तो मेरी ज़िंदगी भी बेवफ़ा लगती है।

साथ में गुजारी हर वो, शाम भूल गए,मोहब्बत वाली बातें, तमाम भूल गए,

कायनात में कायम,बहुत कम ही रहते हैं अपने वादे पे,फिर भी, गिला यही है कि तुम मेरा, नाम भूल गए….!!

बहुत समझाया ख़ुद को मगर समझा नही पाये,बहुत मनाया ख़ुद को मगर मना नही पाये,जाने वो क्या जज्बा था वो एहसास था,

खूब भुलाना चाहा उसे हमने मगर भुला नही पाये...!!

दिल थाम कर जाते हैं हम राहे-वफा से…खौफ लगता है हमें तेरी आंखों की खता से..जितना भी मुनासिब था हमने सहा हुजूर अब दर्द भी लुट जाए तुम्हारी दुआ से…हम तो बुरे नहीं हैं तो अच्छे ही कहां हैं….!!

दुश्मन से जा मिले हैं मुहब्बत के गुमां से वो दफ्न ही कर देते आगोश में हमें लेकर ये मौत भी बेहतर है जुदाई की सजा से..!!

किस किस ने कुचला है मेरे अरमान बताऊ क्या?अपनी जिंदगी की किताब खोलूं,और एक एक पन्ना पढ़कर सुनाऊं क्या?जिस आंगन में बचपन खेला वो मेरा नहीं था।

जो अपना घर है उस घर की परेशानी बताऊं क्या? सबकी नज़र में मेरा खामोश रहना बेहतर है।मैं घुंघट हटा दें।

आंखों से बहता पानी दिखाऊं क्या?किसी को नहीं जानना समझना मेरी भी कुछ चाहत है।कभी कभी सोचती हूं।

दीवारों से सर टकराऊं क्या?किस किस ने….

दिल का दर्द छुपाना कितना मुश्किल है,टूट के फिर मुस्कराना कितना मुश्किल है,दूर तक जब चलो किसी के साथ तो फिर,तनहा लौट के आना कितना मुश्किल है…!!

मैं ढूँडता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता,नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता ! नई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाए,नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता !

वो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मेरा,किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता ! वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे,कि जिन में शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता !

जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ,यहाँ तो कोई मेरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता !खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में,तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता !!

बस कोई ऐसी कमी सारे सफ़र में रह गई…जैसे कोई चीज़ चलते वक़्त घर में रह गई..कौन ये चलता है मेरे साथ बे-जिस्म-ओ-सदा..चाप ये किस की मेरी हर रह-गुज़र में रह गई

गूँजते रहते हैं तनहाई में भी दीवार ओ दर..क्या सदा उस ने मुझे दी थी के घर में रह गई..और तो मौसम गुज़र कर जा चुका वादी के पार..बस ज़रा सी बर्फ़ हर सूखे शजर में रह गई

रात दरिया में फिर इक शोला सा चकराता रहा..फिर कोई जलती हुई कश्ती भँवर में रह गई..रात भर होता रहा है किन ख़ज़ानों का नुज़ूल..मोतियों की सी झलक हर बर्ग-ए-तर में रह गई

लौट कर आए न क्यूँ जाते हुए लम्हे ‘अदीम’…क्या कमी मेरी सदा-ए-बे-असर में रह गई..!

‘अदीम’ हाशमी

एक किस्सा हूं तेरा एक हिस्सा है तू मेरा कितना भी तू इनकार कर ले थोड़ा तो तू एतबार कर ले खो जा मुझमें मे तू चल आ समुंदर से थोड़ा तो बात कर ले…

ये खुली हवा ठहरा आसमान बता कुछ तो होंगे तेरे भी अरमान खुद को जंजीरों से आजाद कर ले मुझको तू अपने लिए खास कर ले अब तो कुछ तो बात कर ले…

किसी से यूं ही नहीं मिलता कोई अकेलेपन यूं ही नहीं निकलता कोई कुछ सपने तो मेरे साथ कर ले कुछ मुझसे भी तो बात कर ले..

यूं ही नही रहो तुम गुमनाम ज़ख्म हो तो बताओ लगाऊं दर्द का काम पिछला निचला सब भूल कर कुछ तो कल की बात कर ले…

यूं ही न नाराज रह कुछ तो मुझसे बात कर ले चेहरे पर थोड़ी मुस्कुराहट कर ले तेरी पसंद की मिठास लाई हु आंखों की जरा तो आहट कर ले गुस्सा छोड़ दे अब थोड़ी तो अब बात कर ले…

सजा देनी है तो सजा दे दे पर बात करने की रजा दे दे कब तक यूं रहेगा रूठा रूठा कुछ न सही तो गलती की ही बात कर ले थोड़ी लड़ाई आज रात भी कर ले गुस्सा निकल कर थोड़ी तो बात कर ले….!!

समझ कर भी समझ नही सकता कोई जमाने तो मौजूद मगर ख़ुद नही रखता कोई जरा सा ठहर कर देखो कोई यूं हीं नहीं बेवजह सहता कोई

मालूम होता हर सख्श की शख्सियत किधर जाती हर बार को उसकी नीयत यूं ही नहीं नदी समुन्दर से है बिछड़ता है कोई ख़ुद से ही हर वक्त लड़ता है कोई

मालूम होता की फितरत क्या थी आखिर उसका बेहरत क्या है सब जान कर भी हैरत थी मैं तमाम गवाही उसकी रेहरत मे थी वाकिफ नही किसी बात का था धोखेबाजी जेहरत में थी।

जरा गौर से देखो ठहरेपन को यूं ही नहीं चोट लगती गहरेपन को। अरे कभी महसूस करके देखो आंसुओ की सासें भर कर देखो कभी रातें जग कर तो देखो हर वक्त कसूरवार यूं ही नहीं कहती ओठो की कपकपियां यूं ही नही रहती।

मालूम है समझोगे नहीं झूठा ही सही दिल कभी रखोगे नहीं चमकते चांद से भी ज्यादा मजबूर रहते हो पास रहकर यूं दूर रहते हो

बस शिकवा एक बात की ही रही खुब समझाया मैने पर समझे नहीं कहते तो खुब थे जानते हो मुझे दिल अपना मानते हो मुझे

कभी खेरियत मेरा भी ली होती कुछ तो मेरा भी ख्याल किया होता

कोई लफ्ज़ मुझे भी बता दो कहां है सुकून जरा मुझे भी जता दो कई अरसों से बहुत परेशान हूं कैसे कहूं कि नाज़ुक जान हूं मैं..

बहुत ही अरमानों से संभाला है ख़ुद को अब तो हूं जैसे कोई बुत हो जरा मुझे भी कोई तसल्ली दिला दो मुझे भी तो कोई कली दिखा दो..

हर तरफ से जली हूं मैं बिन लफ्जों के पाली हूं मैं कोई मुझे भी तो राह दिखा दो सब कुछ भूलना तो सिखा दो..

आहिस्ता आहिस्ता सब खत्म हो गया पल पल पर सब जत्न हो गया कोई मुझे भी बीच भंवर से बचा लो डूब गई हूं समुंदरो के तवंर मैं ढूंढू कहां मैं जरा सुकूं तो दिला दो..!

पाया तो भी मेने कुछ,फिर भी खोने का मुझे डर था,अब जिंदगी ही चली गई दिल जलना क्या कम था,तू भूल गया है शायद,इस बात को,जिस कदर जलाया है तूने मुझे,उसमे आग जरा काम था।

लुटेरों ने भी मुझे तब लूटा,जब दीए मे भी तेल कम था।इस कदर जलाया है तूने मुझे,जिस कूऐ मे गए हम,वो पानी नही छल था,और क्या अब मे जमाने से लडू जमाना भी कमभखत तुझ से था।

देख जरा गस्ति मेरी भी,क्या खवाबो की हस्ती कम थी,चेहरे का सीसा भी ले गया,की जमाने का देखना भी कम था,डुबोया भी है तूने उस जगह जहां,आग का पानी भी कम था।

मोहब्बत मे शायद तुझे कमी लगी,जो दर्द देने लगा है तू।सपनों भरे आँखों की जगह ,आँसू देने लगा है तू निशान शायद कम थे जो जख्म देने लगा है तू।

शायद मुझ मे वो बात न थी,जो मुझ तक रूका रहे तू, या तुझमें ही जज्बात नहीं जो किसी और को साथ लिए जा रहा है तू निशान शायद कम थे जो जख्म देने लगा है तू।

खटखटाते रहिए एहसासो के दरवाजे मुलाकातें ना सही आहटें आनी चाहिए मिल जाता है दो पल का सुकूंन चंद यारों की बंदगी में वरना परेशां कौन नहीं अपनी अपनी ज़िंदगी में…!!

तूझे क्या मालूम जख्मों का दर्द,जो राख में भी नफा ढूंढता हो,जलना तो हमने सीखा है,जो मिट जाने मे भी तेरा भला ढूंढता हो।

वफा करी है हमने कोई ढोंग नहीं, तूझे क्या मालूम, ऐ राख करने वालो,ज़ो आग से रूबरू हूआ ही नहीं।

वो किसी का मिटाना क्या जाने जो चिता पर भी कर्जदार ढूंढता हो, तूझे क्या मालूम जख्मों का दर्द,जो राख में भी नफा ढूंढता हो।

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